दुनियावी शोर से किनारा कर 10 दिनों तक खुदा की राह में मशगूल रहे हम्माद, मुज़म्मिल, हसन और नोमान
BBC CRIME TV
उत्तरप्रदेश,कानपुर नगर
शहर के घंटाघर स्थित ऐतिहासिक बड़ी मस्जिद में रमज़ान के मुकद्दस आखिरी अशरे का एतिकाफ आज पूरी अकीदत और रूहानी सुकून के साथ मुकम्मल हुआ। बीसवें रोज़े की शाम को शुरू हुई इस दस दिवसीय विशेष इबादत का समापन चाँद के दीदार के साथ हुआ। इस वर्ष एतिकाफ में बच्चों का उत्साह और समर्पण चर्चा का विषय बना रहा।घंटाघर बड़ी मस्जिद में एतिकाफ पर बैठे चार बच्चों—हम्माद, मुज़म्मिल, हसन और नोमान—ने दुनियावी शोर-शराबे से किनारा कर खुद को अल्लाह की इबादत में वक्फ कर दिया। इन दस दिनों के दौरान इन मासूमों ने निरंतर तिलावत-ए-क़ुरआन, नफ़्ल नमाज़ और दुआओं में अपना वक्त बिताया। इसी प्रकार, पुराना हैदरगंज निवासी मासूम हमज़ा शहीद ने भी अपने क्षेत्र की मस्जिद में एतिकाफ कर इबादत की एक मिसाल पेश की। कम उम्र में धर्म के प्रति इन बच्चों का यह जज़्बा स्थानीय लोगों के लिए प्रेरणा का केंद्र रहा।
जैसे ही ईद का चाँद नज़र आया और एतिकाफ की अवधि पूर्ण हुई, मस्जिदों में रौनक और खुशी का माहौल छा गया। मस्जिद से बाहर आने पर इन नन्हें इबादतगुज़ारों का मस्जिद कमेटी और क्षेत्रीय लोगों ने गर्मजोशी से इस्तक़बाल किया। लोगों ने उन्हें फूल-मालाएं पहनाईं और उनकी इस कठिन साधना के लिए हौसला अफ़ज़ाई की।मस्जिद कमेटी के जिम्मेदार पदाधिकारियों ने बच्चों के इस जज़्बे की सराहना करते हुए कहा:
"आज के दौर में बच्चों का खेल-कूद और दुनियावी आकर्षण छोड़ इबादत में इतनी दिलचस्पी लेना समाज के लिए एक सकारात्मक और बेहतरीन पैग़ाम है। अल्लाह इन मासूमों की इबादतों को कुबूल फरमाए और उन्हें दीन की राह पर कायम रखे।"
यह मंज़र एक बार फिर इस बात की तस्दीक करता है कि रमज़ान केवल उपवास का नहीं, बल्कि सब्र, त्याग और तक़वा हासिल करने का महीना है, जिसमें एतिकाफ जैसी सुन्नतें इंसान को रूहानी तौर पर मज़बूत बनाती हैं।
सुरेश राठौर


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