"घंटाघर का 'जाल', यात्रियों का बुरा हाल: स्टेशन के गेट पर सिंडिकेट का कब्जा, छूट रही लोगों की ट्रेन"
BBC CRIME TV
उत्तरप्रदेश,कानपुर नगर
घंटाघर चौराहे पर अतिक्रमण और अवैध वसूली का खेल जारी है। नगर निगम के भारी-भरकम 'अतिक्रमण हटाओ अभियान' के हफ्तों बीत जाने के बाद भी जमीन पर धेला भर बदलाव नहीं आया है। हालात जस के तस बने हुए हैं—वही बेतरतीब ठेले, वही अवैध कब्जे और वही वसूली का पुराना सिंडिकेट, जिसके आगे नगर निगम बेबस नजर आ रहा है।
सबसे गंभीर स्थिति कानपुर सेंट्रल स्टेशन के मुख्य गेट की है। घंटाघर चौराहा स्टेशन का प्रवेश द्वार होने के कारण चौबीसों घंटे व्यस्त रहता है, लेकिन अवैध ठेलों और बेतरतीब कब्जे ने इस मार्ग को असुरक्षित बना दिया है। जाम का आलम यह है कि ट्रेन पकड़ने आ रहे यात्रियों की सांसे अटक जाती हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि आए दिन यात्रियों की ट्रेनें सिर्फ इसलिए छूट जाती हैं क्योंकि वे स्टेशन के मुहाने पर आकर 20-30 मिनट तक जाम में फंसे रह जाते हैं। भारी सामान लेकर पैदल चलना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।हैरत की बात यह है कि जिस स्थान पर कुछ दिन पूर्व बुलडोजर गरजा था, आज वहां फिर से अवैध ठेलों की कतारें लग गई हैं। सूत्रों के मुताबिक, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई महज एक 'अस्थायी' और कागजी खानापूर्ति साबित हुई है। नगर निगम की टीम के जाते ही सिंडिकेट के गुर्गे सक्रिय हो जाते हैं और दोबारा दुकानें सजवा देते हैं। राहगीरों का पैदल चलना तो दूर, अब वहां से दुपहिया वाहन निकालना भी किसी जंग जीतने जैसा है।स्थानीय सूत्रों का दावा है कि घंटाघर क्षेत्र में वसूली का नेटवर्क इतना मजबूत है कि यहां पटरी दुकानदारों से बाकायदा 'डेली ड्यूटी' और 'मंथली' के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है। इस अवैध कमाई का एक बड़ा हिस्सा रसूखदारों की जेब में जा रहा है। सिंडिकेट की शह पर ही स्टेशन के ठीक सामने बेतरतीब तरीके से ठेले लगवाए जाते हैं।
जनता के सवाल: कब मिलेगी जाम के जंजाल से मुक्ति?
सूत्रों की माने तो घंटाघर की जनता और देश भर से आने वाले यात्री अब महापौर और नगर आयुक्त से सीधे सवाल पूछ रहे हैं—क्या अतिक्रमण के खिलाफ अभियान सिर्फ कागजों और फोटो खिंचवाने तक सीमित है? क्या नगर निगम का प्रवर्तन दस्ता इस संगठित सिंडिकेट के सामने सरेंडर कर चुका है? पुलिस और नगर निगम की आपसी खींचतान और मिलीभगत का खामियाजा आम जनता को भीषण जाम और प्रदूषण के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
"अभियान चलाना आसान है, लेकिन उसे बरकरार रखना असली चुनौती है। घंटाघर में प्रशासन की इच्छाशक्ति की कमी और सिंडिकेट की हनक साफ झलक रही है।"
सुरेश राठौर


0 Comments